झूलेलाल उत्सव चेटीचंड, जिसे सिंधी समाज सिंधी दिवस के रूप में मनाता चला आ रहा है, इस वर्ष 02 अप्रैल को मनाया जा रहा है व इसी दिन सिंधियों का नया वर्ष शुरू होता है। इस दिन सिंधी समाज अपना कारोबार बंद रख पूर्ण रूप से भगवान की आराधना में लिप्त रहता है। इस वर्ष यह त्यौहार कोरोना की महामारी के चलते लगभग सार्वजानिक तौर पर हर जगह रद्द किया गया है, पर भगवान की आस्था हर सिंधी के दिल में बसी है व बसी रहेगी। घर-घर में जरूर व्यक्तिगत भगवान झूलेलाल की पूजा होगी व भगवान से प्रार्थना होगी कि जल्द कोरोना महामारी से विश्व को बचाएं व विश्व जल्द ही पहले जैसा खुशहाल रहे।
सिंधी समाज के बाहुल्य वाले शहर उल्हासनगर में यह त्यौहार विशेष रूप से मनाया जाता है। आज झूलेलाल मंदिर से उल्हासनगर 1 झूलेलाल मंदिर से सिंधी समाज के इष्टदेव झूलेलाल भगवान के जन्म उत्सव पर उल्हासनगर एक झूलेलाल मंदिर से महायात्रा पैदल निकाली जाएगी। यह यात्रा उल्हासनगर 1 मुख्य बाजार से होते हुए नेहरू चौक, फर्नीचर बाजार 17 सेक्शन के रास्ते उल्हासनगर 5 चालिया साहब के मंदिर तक जाएगी। इस महायात्रा में उल्हासनगर के व्यापारी सिंधी समुदाय के नेता और सैकड़ों सिंधी भाई शामिल होंगे।
बता दें कि भगवान झूलेलाल की कहानी पौराणिक है। भारतीय धर्मग्रंथों में कहा गया है कि जब-जब अत्याचार बढ़े हैं, नैतिक मूल्यों का क्षरण हुआ है तथा आसुरी प्रवृत्तियां हावी हुई हैं, तब-तब किसी न किसी रूप में ईश्वर ने अवतार लेकर धर्मपरायण प्रजा की रक्षा की। संपूर्ण विश्व में मात्र भारत को ही यह सौभाग्य एवं गौरव प्राप्त रहा है कि यहां का समाज साधु-संतों के बताए मार्ग पर चलता आया है।
शताब्दियों पूर्व सिंधु प्रदेश में मिर्ख शाह नाम का एक राजा शासन करता था। राजा बहुत दंभी तथा असहिष्णु प्रकृति का था, सदैव अपनी प्रजा पर अत्याचार करता था। उसके शासनकाल में सांस्कृतिक और जीवन-मूल्यों का कोई महत्व नहीं था। पूरा सिन्धु प्रदेश राजा के अत्याचारों से त्रस्त था। उन्हें कोई ऐसा मार्ग नहीं मिल रहा था, जिससे वे इस क्रूर शासक के अत्याचारों से मुक्ति पा सकें।
लोककथाओं में यह बात लंबे समय से प्रचलित है कि मिर्ख शाह के आतंक ने जब जनता को मानसिक यंत्रणा दी तो नागरिकों ने ईश्वर की शरण ली। सिन्धु नदी के तट पर ईश्वर का स्मरण किया तथा वरुण देव उदेरोलाल ने जलपति के रूप में मत्स्य पर सवार होकर दर्शन दिए। तभी नामवाणी हुई कि अवतार होगा एवं नसरपुर के ठाकुर भाई रतनराय के घर माता देवकी की कोख से उपजा बालक सभी की मनोकामना पूर्ण करेगा। समय ने करवट ली और नसरपुर के ठाकुर रतनराय के घर माता देवकी ने चैत्र शुक्ल 2 संवत 1007 को बालक को जन्म दिया एवं उसका नाम उदयचंद रखा गया। इस चमत्कारिक बालक के जन्म का हाल जब मिर्ख शाह को पता चला तो उसने अपना अंत मानकर इस बालक को समाप्त करवाने की योजना बनाई।
बादशाह के सेनापति दल-बल के साथ रतनराय के यहां पहुंचे और बालक के अपहरण का प्रयास किया लेकिन मिर्ख शाह की फौजी ताकत पंगु हो गई। उन्हें उदेरोलाल सिंहासन पर आसीन दिव्य पुरुष दिखाई दिया। सेनापतियों ने बादशाह को सब हकीकत बयान की। उदेरोलाल ने किशोर अवस्था में ही अपना चमत्कारी पराक्रम दिखाकर जनता को ढाढस बंधाया और यौवन में प्रवेश करते ही नागरिकों से कहा कि बेखौफ अपना काम करें। उदेरोलाल ने बादशाह को संदेश भेजा कि शांति ही परम सत्य है। इसे चुनौती मान बादशाह ने उदेरोलाल पर आक्रमण कर दिया।
बादशाह का दर्प चूर-चूर हुआ और उसने पराजय झेलकर उदेरोलाल के चरणों में स्थान मांगा। उदेरोलाल ने सर्वधर्म समभाव का संदेश दिया। इसका असर यह हुआ कि मिर्ख शाह उदयचंद का परम शिष्य बनकर उनके विचारों के प्रचार में जुट गया। उपासक भगवान झूलेलाल जी को उदेरोलाल, घोड़ेवारो, जिन्दपीर, लालसांईं, पल्लेवारो, ज्योतिनवारो, अमरलाल आदि नामों से पूजते हैं। सिन्धु घाटी सभ्यता के निवासी चैत्र मास के चन्द्र दर्शन के दिन भगवान झूलेलाल जी का उत्सव संपूर्ण विश्व में चेटीचंड के त्यौहार के रूप में परंपरागत हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं।
चूंकि भगवान झूलेलाल जी को जल और ज्योति का अवतार माना गया है, इसलिए काष्ठ का एक मंदिर बनाकर उसमें एक लोटी से जल और ज्योति प्रज्वलित की जाती है और इस मंदिर को श्रद्धालु चेटीचंड के दिन अपने सिर पर उठाकर, जिसे बहिराणा साहब भी कहा जाता है, भगवान वरुणदेव का स्तुति गान करते हैं एवं समाज का परंपरागत नृत्य छेज करते हैं। यह सर्वधर्म समभाव का प्रतीक है।


