'हे, आज मैं कैसी लग रही हूं?'
वो अक्सर ये सवाल पूछती और सबसे पूछती। मुझ जैसे बेशऊर और बेढंगे से भी। कोई उसे हॉट कह देता तो कोई स्टनिंग। और मैं सिर्फ अच्छा। दरअसल मैं उसको उसके आंखों से परे कभी देख ही नहीं पाया। आंखों का इमोशन डिवाइन होता है और डिवाइन प्योर।
मुझे उसकी आंखों में क्रांति दिखता, इंकलाब दिखता...
उसकी आंखें जो कभी रोती तो जी करता कि सारे जमाने की खुशियां इसके दामन में भर दूं...हँसती तो लगता जैसे कपास केे पोहे आंखों में उग आए हो। हज़ारों दिलकश ख्वाबों से आच्छादित उसकी आंखें जिसमें जादू के बादल उमड़ते थे...
आज जब वो जा रही है तो मैं देख रहा हूं उसकी आंखें। वो खिड़की से नीचे देख रही है।
वो देख रही है बस स्टॉप पर खड़े बस को। मुसाफिर भरे जा रहे हैं । बस चल पड़ती है। सबको अपनी मंजिल पर पहुँचाकर फिर वापस खड़ी हो जाती है उसी बस स्टॉप पर।
वो देख रही ऊंची अट्टालिकाओं की खिड़कियों के बाहर लगे एसी को। वो सोच रही है कि आखिर कैसे धूप, बारिश, ठंड सब सहकर भी दफ्तरों को सर्द रखता है।
वो देख रही है समंदर को। हर रोज उसकी लहरें आसमान से बातें करती है लेकिन आज भीतर से तारांगित है।
वो देख रही है जमीन और आसमान के बीच पसरी दूरियों को। दो छोरों को जो कभी नहीं मिले लेकिन उनका वज़ूद सदियों से है।
मैं जानता हूं कि जाना हिंदी की सबसे खतरनाक क्रिया है। मैं उसका जाना जानता हूँ। फिर भी खामोश हूं। यही नियति है। उसे रोकने की बेबसी और अधिक बुरी होगी। वो जा चुकी है। मैं बहुत देर तक उसे जाते हुए देख रहा हूं। मैं देख रहा हूँ उसे। वो जा चुकी है। बहुत सारी बातें करनी थी उससे और वो एक बात भी जो जरा से जरा सी ज्यादा थी। वह बात जो है तो सही मगर है जाने क्या? मैं नहीं समझ पाता कि बात क्या है। में उलझ जाता हूं कि अगर बात है तो मालूम होनी चाहिए मगर बहुत सोचने के बाद भी कोई बात समझ नहीं आती।
कितना अजीब होता है न उससे बिछड़ना जिससे आप कभी मिले ही न थे।